सुबह का इंतज़ार कौन करे…

सुरमई रात है, सितारे हैं
आज दोनों जहाँ हमारे हैं
सुबह का इंतज़ार कौन करे..

ये रुत ये समाँ मिले न मिले
आरज़ू का चमन खिले न खिले
वक़्त का ऐतबार कौन करे…

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सावन में आल्हा-पाठ : सेना के कूच का वर्णन

बुंदेलखंड में सावन के महीने में बरसात की रिमझिम के बीच “आल्हा” गाने का प्रचलन है। वीर-रस के इस काव्य में महोबा के चंदेल शासकों और उनके बनाफर सामंतों आल्हा और ऊदल की शौर्य गाथाओं का वर्णन है। सोचा इस अवसर पर क्यों न उनके वीर-रस की एक झलक अपने ब्लॉग पर उपलब्ध कराई जाये। प्रस्तुत ज़िक्र आल्हा, ऊदल और बाकी भाइयों के द्वारा चंदेल राजा परिमाल (परिमर्दन देव) की सहमति से नर्मदा नदी के किनारे स्थित माड़ौ (संभवतः वर्तमान माण्डू) पर अपने पिता की ह्त्या का बदला लेने के लिये किये गये आक्रमण का है।

Statue of Udal in Mahoba (source: Wikimedia)

Statue of Udal in Mahoba (source: Wikimedia)

कहानी के अनुसार माड़ौ के बघेल वंशीय राजकुमार करिया (राजा जम्बे का पुत्र) ने एक बार रात के अँधेरे में महोबा के सीमान्त कस्बे दशहरि पुरवा पर चढ़ाई करके, अपनी एक पिछली पराजय के अपमान का बदला चुकाने के लिये, महलों में लूट-पाट कराई थी और साथ ही आल्हा-ऊदल के पिता (देशराज) और चाचा (बच्छराज) की हत्या कर दी थी और उनकी लाश ले जाकर पत्थर के कोल्हू में पेर दी थी, और सर काट कर बरगद पर लटका दिए थे। उस समय आल्हा की उम्र मात्र ५ वर्ष थी, जबकि ऊदल माँ के गर्भ में थे। चचेरे भाई मलखान ३ वर्ष के थे। बड़े होने पर जब ऊदल को इस घटना की जानकारी हुई तो उन्होंने संकल्प लिया कि वह बाप की मौत का बदला लेंगे। उस समय उनकी उम्र कथानुसार महज १२ वर्ष थी।

बरस अठारह के आल्हा भये, औ सोलह के भये मलखान
लगी बारहीं जब ऊदल की, तब माड़ौ पर हन्यो निशान

आल्हा-खण्ड में दिये गये वर्णन के अनुसार जब ऊदल (उदयसिंह) को अपनी माँ से अपने पिता की हत्या और महलों में हुई लूट का पता चलता है, तो:

जैसे करिया थर में बदले, औ ललकारे बाघ गुर्राय
तड़पा ऊदल शीश महल में, औ माता से कही सुनाय
खोज मिटा दूँ मैं माड़ौ की, तो तेरा पुत्र उदयसिंह राय
पिता जिन्हों के ऐसे मर गये, उन के जीवे को धिक्कार
तुम तो माता घर में बैठो, मेरी पूजि देव तलवार
काटि खोपड़ी लूँ जम्बे की, डारूँ मारि करिंगा राय
बदला ले लेउँ जब दाऊ का, तब छाती का डाहि बुताय

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मेरे साथी ख़ाली जाम…

महफ़िल से उठ जाने वालो, तुम लोगों पर क्या इल्ज़ाम
तुम आबाद घरों के वासी, मैं आवारा और बदनाम
मेरे साथी ख़ाली जाम….

दो दिन तुमने प्यार जताया, दो दिन तुमसे मेल रहा
अच्छा खासा वक़्त कटा, और अच्छा खासा खेल रहा
अब उस खेल का ज़िक्र ही कैसा, वक़्त कटा और खेल तमाम
मेरे साथी ख़ाली जाम….

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आल्हा जयंती पर आल्हा की याद में….

रामांशं तं शिशुं ज्ञात्वा प्रसन्नवदनं शुभम् । भाद्रकृष्णतिथौ षष्ठयां चन्द्रवारे अरुणोदये ।।  १५
सञ्जातः कृत्तिकाभे च पितृवंशयशस्करः । आह्लाद नाम्राह्यभवत्प्रश्रितश्च महीतले ।।  १६  

आज, अर्थात २८ मई २०१७ को, पञ्चाङ्ग पर नज़र गई तो देखा कि २५ मई को आल्हा जयंती थी। इसके पहले मुझे मालूम ही नहीं था कि इस पूर्व-मुग़ल कालीन और पूर्व-सल्तनत कालीन (१२वीं शताब्दी के) ऐतिहासिक पुरुष का जन्मदिन न सिर्फ़ ज्ञात है, बल्कि पञ्चाङ्ग (लाला रामस्वरूप रामनारायन) में भी अंकित होता है।

हिंदी साहित्य के विषय में जिस ने भी स्कूल में पढ़ा है, उसने वीर रस काल, और उसके महाकाव्यों, के बारे में कुछ तो पढ़ा ही होगा।  जो दो महाकाव्य वीर रस काल के प्रसिद्ध हैं, उनमें से एक तो है जगनिक का “आल्हखण्ड”, इसके तो नाम से ही ज़ाहिर है कि यह आल्हा के विषय में है।  दूसरा महाकाव्य है चंद वरदाई का “पृथ्वीराज रासो”। इन दोनों ही महाग्रंथों में आल्हा और उनके छोटे भाई ऊदल (तथा चचेरे भाइयों मलखान और सुलखान) की शौर्यगाथा वर्णित है।

Alha Chowk in Mahoba (source: http://ecourts.gov.in/Mahoba/Mahoba_History)

आल्हा, ऊदल और उनका परिवार (बनाफर वंशीय क्षत्रिय) महोबा के चंदेल राजा परिमाल (परिमर्द देव) के सामंत थे। बुंदेलखंड के महोबा शहर का प्राचीन नाम महोत्सव नगर और भविष्य महापुराण के अनुसार महावती नगर था। लोकगाथा में अक्सर इन भाइयों को क्रमशः युधिष्ठर और भीम का अवतार माना जाता है। उस समय के लगभग सारे किरदार महाभारत के किरदारों से जोड़े जाते हैं जो कि कथित रूप से शिवजी के श्राप से कलियुग में पुनः अवतरित हुए और पांडवों ने अपने अभिमान का प्रायश्चित इस तरह से किया कि इस बार धर्मनिष्ठ पांडवों की मृत्यु कुरीति पर चलने वाले कौरवों के हाथों हुई, जो कि दिल्ली में पृथ्वीराज चौहान और उनके साथियों के रूप में जन्मे थे। जैसे अर्जुन का जन्म राजा परिमाल के बेटे ब्रह्मा के रूप में, द्रौपदी का पृथ्वीराज चौहान की बेटी बेला के रूप में और शकुनि का जन्म उरई के राजा माहिल (महीपति) के रूप में माना जाता है।  नकुल और सहदेव को क्रमशः आल्हा के चचेरे छोटे भाई मलखान और कन्नौज के राजा जयचंद के भतीजे लाखन के रूप में अवतरित माना जाता है।  आल्हा-गायन में पृथ्वीराज चौहान को अक्सर दुर्योधन का अवतार माना जाता है।  लेकिन यह मान्यतायें समय, शास्त्र और क्षेत्र के हिसाब से बदलती रहती हैं।  उदाहरण के लिये भविष्य महापुराण में इस कथा में थोड़ा मोड़ है। पुराण के मुताबिक़ पांडवों का साथ देने के लिए भगवान कृष्ण ने भी पुनः पृथ्वी पर आने का वचन दिया था और कहा था कि वह स्वयं ऊदल के रूप में (कृष्णांश) और उनका राम का स्वरूप आल्हा के भेष में पांडवों का साथ देने के लिए अवतरित होगा।

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पर्बतों के पेड़ों पर…

पर्बतों के पेड़ों पर, शाम का बसेरा है
सुरमई  उजाला है, चंपई अँधेरा है

दोनों वक़्त मिलते हैं, दो दिलों की सूरत से
आसमाँ ने खुश होकर, रंग सा बिखेरा है

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