देनदार कोई और है…

देनदार कोउ और है, देत रहत दिन-रैन ।
लोग भरम हम पर करें, ताते नीचे नैन ।।

कविअब्दुर्रहीम खान खाना / Abdul Rahim Khan-I-Khana

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शमा जलती रहे, तो बेहतर है…

टैंक आगे बढ़ें, या पीछे हटें,

कोख धरती की, बांझ होती है ।

फ़तह का जश्न हो, या हार का सोग,

जिंदगी, मय्यतों पर रोती है ।।

इसलिए, ऐ शरीफ़ इंसानो,

जंग टलती रहे, तो बेहतर है ।

आप और हम सभी के, आंगन में,

शमा जलती रहे, तो बेहतर है ।।

रचना : साहिर लुधियानवी

स्रोत: 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के वो 22 दिन, रेहान फ़ज़ल की बीबीसी हिंदी पर रिपोर्ट

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हसरत-ए-दीदार

दिल को नियाज़-ए-हसरत-ए-दीदार कर चुके
देखा तो हम में ताक़त-ए-दीदार भी नहीं

शेर: मिर्ज़ा ग़ालिब

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पापी दिल

मस्जिद तो बना दी शब भर में, ईमाँ की हरारत वालों ने
दिल अपना पुराना पापी है, बरसों में नमाज़ी हो न सका

शेर: इक़बाल

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अब तेरा इंतज़ार कौन करे…

सुरमई रात ढलती जाती है
रूह ग़म से पिघलती जाती है

तेरी ज़ुल्फ़ों से प्यार कौन करे
अब तेरा इंतज़ार कौन करे

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