दशकों बाद …

दशकों बाद मुझसे
किसी की मुलाकात हुई ।

शांत पानी में छलकती
एक प्रतिबिम्ब की तरह,
उपवन के उस कोने में खिले
उस अनजाने गुलाब की अनजानी सुगंध की तरह,
वर्षा की पहली फुहार के साथ,
खिड़की से आती उस बयार की तरह,

लगा जैसे,
मैं तो इसे शायद पहचानता हूँ,
दशकों से उसकी झलक
किसी कोने में खड़ी थी,
शायद इस इंतज़ार में
कि रोशनी की कोई लकीर उस पर पड़े
और शायद
मैं उसे पहचान पाऊँ।

वह भीड़ में चलता
कोई भी शख्स हो सकता था
वह
किनारे पर आ कर टूटती
कोई भी लहर हो सकती थी,
लाइब्रेरी में उपलब्ध
हज़ारो किताबों में से
कोई भी पन्ना हो सकता था,
आसमान में चमकते
करोड़ों तारों में
कोई भी हो सकता था ।

पर आज इतने दशकों के बाद
पहली बार मैंने
शांत पानी में उस प्रतिबिम्ब को
उपवन के कोने में खिले  उस
अनजान गुलाब की
अनजानी सुगंध को
वर्षा की पहली फुहार के साथ
खिड़की से आती उस बयार को
दशकों से किसी कोने में खड़ी
इंतज़ार करती उस झलक को

भीड़ में चलते उस गुमनाम शख्स को
किनारे पर आ कर टूटती उस लहर को
लाइब्रेरी की हज़ारों किताबों के बीच
उस पन्ने को
आसमान में चमकते
करोड़ों तारों में
उस तारे को पहचाना ।

अरे, वह तो मैं हूँ ।

दशकों बाद मुझसे मेरी मुलाकात हुई

रचना : अरविंद सिन्हा

१९ मार्च २०१६

Authored by: Arvind Sinha

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