Tag Archives: हिन्दी पद्य

दशकों बाद …

दशकों बाद मुझसे किसी की मुलाकात हुई । शांत पानी में छलकती एक प्रतिबिम्ब की तरह, उपवन के उस कोने में खिले उस अनजाने गुलाब की अनजानी सुगंध की तरह, वर्षा की पहली फुहार के साथ, खिड़की से आती उस … Continue reading

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तत्कालीन भारत और आधुनिक ग्रीस

एक बार बहुत पहले ये कविता कहीं पढ़ी थी। लिखी तो गयी थी ये संभवतः साठ-सत्तर के दशक के भारत के लिये। पर आज तो लगता है कि जैसे ये अब ग्रीस (यूनान) पर भी चरितार्थ होती है: आय इकाई, … Continue reading

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क़िस्मत बिगड़ी, दुनिया बदली…

क़िस्मत बिगड़ी, दुनिया बदली, फिर कौन किसी का होता है ऐ दुनिया वालो सच कहो, क्या प्यार भी झूठा होता है

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ज़माने का दस्तूर है ये पुराना

ज़माने का दस्तूर, है ये पुराना मिटा कर बनाना, बना कर मिटाना ज़माने का दस्तूर, है ये पुराना

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दहेज की बारात

जा दिन एक बारात को मिल्यौ निमंत्रण-पत्र फूले-फूले हम फिरें, यत्र-तत्र-सर्वत्र यत्र-तत्र-सर्वत्र, फरकती बोटी-बोटी बा दिन अच्छी नाहिं लगी अपने घर रोटी कहँ ‘काका’ कविराय, लार म्हौंड़े सों टपके कर लड़ुअन की याद, जीभ स्याँपन सी लपके

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